Monday, 9 December 2013

वो एक काम जो नेहरु को पीएम बनने के बाद सबसे पहले करना चाहिए था लेकिन नहीं किया



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मैं हैरान हूँ ,वीर सावरकर के लिए क्या कुछ ये दिल्ली के नेता बोल रहे हैं ,अरे !! जिसने अपनी सारी जवानी खपा दी देश कि आजादी के लिए उसके बारे में ऐसी सोच


मित्रों हिंदुस्तान कि आजादी कि जंग कि 2 मुख्यधारा रहीं – एक सशस्त्र क्रान्ति कि और दूसरी अहिंसक आंदोलनों कि , और मजे कि बात देखिये कि दोनों का नेतृत्व गुजरात में था , अहिंसक आंदोलन का नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया, सरदार पटेल ने किया और सशस्त्र क्रान्ति का नेतृत्व श्यामजीकृष्ण वर्मा, मैडम कामा आदि वीरों ने किया और श्यामजीकृष्ण वर्मा ने तो लन्दन में ही इंडिया हाउस बनाया था जहाँ पे वे नवयुवकों को प्रशिक्षित करते थे, उन्हें प्रेरणा देते थे भारत कि आजादी के लिए क्रन्तिकारी बनने कि


इसीलिए लोकमान्य तिलक जी ने श्यामजीकृष्ण वर्मा जी को एक चिट्ठी लिखी थी कि मैं इस नौजवान( वीर सावरकर ) को आपके पास लन्दन भेज रहा हूँ ,आप इसकी शिक्षा ,दीक्षा,स्कोलरशिप आदि कि व्यवस्था करें ,और श्यामजीकृष्ण वर्मा हिंदुस्तान से जो भी मेघावी छात्र होते थे उनको स्कोलरशिप देकर अपने पास लन्दन बुलाते थे और वे और अच्छी पढाई कर सकें इसमें उनकी मदद करते थे लेकिन एक नियम रखते थे कि अपनी पढाई पूरी करने के बाद वह छात्र कभी भी अंग्रेजों कि सेवा नहीं करेगा ,उनके यहाँ नौकरी नहीं करेगा और हिंदुस्तान कि आजादी कि जंग में एक सैनिक बनेगा ऐसा वो नियम रखते थे , अब आप जरा सोचिये लन्दन में रहते हुए भी अंग्रेजों कि नाक के नीचे ऐसा नियम बनाना कितना कठिन होगा और उसे बनाने वाला कितनी ताकत रखता होगा तब जाकर ऐसा नियम बनाने कि हिम्मत कि होगी , और लोकमान्य तिलक जी के कहने पर सावरकर जी कि श्यामजीकृष्ण वर्मा ने मदद कि


श्यामजीकृष्ण वर्मा ने जो लन्दन में इंडिया हाउस बनाया था वो अंग्रेजों कि नाक के नीचे लन्दन में भारत कि आजादी के आंदोलन का एक सबसे बड़ा तीर्थ बन गया था , लेकिन देश के इतिहास को कैसे भुला दिया जाता है इसका एक उदहारण हैं श्यामजीकृष्ण वर्मा , वे जीवनभर स्वतंत्रता सेनानियों को ,सशस्त्र क्रांतिकारियों को मदद करते रहे ,प्रेरणा देते रहे ,उन्हें बल प्रदान करते रहे , ये वही श्यामजीकृष्ण वर्मा थे जिन्होंने मदन लाल ढींगरा जी को कहा था कि आप कर्नल वाईली का हिसाब चुकता करो और वहीँ इंडिया हाउस में कर्नल वाइली को मारने का काम मदन लाल ढींगरा जी ने किया था , उन्हीं श्यामजीकृष्ण वर्मा जी का स्वर्गवास 1930 में हुआ था


स्वर्गवास से पहले श्यामजीकृष्ण वर्मा लिख करके गए थे कि मेरे मरने के बाद मेरी अस्थियां सम्भाल कर रखी जाएँ ,मैं अपने जीते जी तो स्वंतंत्र भारत के दर्शन नहीं कर सका लेकिन मेरे मरने के बाद जब हिन्दुस्तान स्वतंत्र हो तो मेरी अस्थियां उस स्वतंत्र भारत कि धरती पर ले जाईं जाएँ , ये इच्छा श्यामजीकृष्ण वर्मा ने 1930 में अपने स्वर्गवास से पहले व्यक्त कि थी लेकिन देश कि आजादी के लिए जीने और मरने वाले इस व्यक्ति कि कथा देखिये


15 August 1947 को हिंदुस्तान के स्वतंत्र होने पर भारत का तिरंगा झंडा लहराने के पश्चात 16 August 1947 को पंडित नेहरु का पहला काम ये होना चाहिए था कि वे अपने एक प्रतिनिधिमंडल को विदेश भेजते और श्यामजीकृष्ण वर्मा कि अस्थियों को आजाद भारत में ले आते और उस वीर पुरुष कि इस अंतिम इच्छा को पूरा करके उसे श्रधान्जली अर्पित करते ......लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया ......इतना ही नहीं 73 साल तक i.e for 73 Years वो अस्थियां स्विट्जरलैंड के जिनेवा में इन्तेजार करती रही कि कोई भारत माँ का बेटा आएगा और मेरी अस्थि स्वंतंत्र हिंदुस्तान में ले जाकर मेरी आत्मा को शान्ति प्रदान करेगा


भाइयों और बहनों , मैं 2003 में स्विट्जरलैंड में जिनेवा में गया और श्यामजीकृष्ण वर्मा जी कि अस्थियों को अपने कंधे पर रखकर आज़ाद हिंदुस्तान में लाया , और आज मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि थोड़ा समय निकालकर कच्छ जाइए और कच्छ में श्यामजीकृष्ण वर्मा के जन्मस्थान मांडवी जाइए ,मैंने मांडवी में वैसा ही इंडिया हाउस बनवाया है जैसा कि श्यामजीकृष्ण वर्मा ने लन्दन में बनाया था और जहाँ से वे आजादी कि लड़ाई कि अलख जगाते थे , पूरा का पूरा वैसा ही बनवाया है , और वहाँ पर देश के विभिन्न क्रांतिकारियों का स्मरण करवाते हुए एक क्रांति-तीर्थ भी बनवाया है ,और मेरा मानना है कि देशभक्ति में डूबे हुए हर व्यक्ति को अपने परिवार के साथ जाकर अपने बच्चों को आधे दिन उस क्रांति-तीर्थ में रखना चाहिए ताकि उन्हें भी मालुम पड़े कि कैसे लोग जिंदगी जीते थे ''

- नरेंद्र मोदी

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