'' इस देश में एक वर्ग ऐसा है जो ये समझता है कि हिन्दुस्तान
का जन्म 15 अगस्त 1947 को हुआ और जो लोग
बिना सही इतिहास को जाने उनकी ये बात मान लेते हैं कि हिन्दुस्तान 15 अगस्त 1947 को ही पैदा हुआ वे
सारे फिर गलत रास्ते और गलत सोच के शिकार हो जाते हैं , लेकिन जो जानते हैं और मानते हैं कि
हिन्दुस्तान का जन्म कोई 15 अगस्त 1947 को नहीं हुआ अरे ये हिन्दुस्तान तो एक
सहस्त्रों वर्षों पुरानी एक महान सांस्कृतिक धरोहर से पैदा हुआ है , उस महान
सांस्कृतिक धरोहर से जो कि समय के हर पहलु को पार करते हुए ,कठिनाइयों से रास्ता
खोजते हुए ,सारे विश्व के
कल्याण कि कामना करते हुए आज भी आगे बढ़ रही है, और यही कारण है कि विश्व कि अनेक
सभ्यताएं ,अनेक संस्कृतियों ,अनेक हस्तियों के
मिटने के बाद भी हमारी हस्ती मिटती नहीं है
जिस संस्कृति के कारण हम आज भी खत्म नहीं हुए हैं ,जिसने हमें आज भी बचाए रखा है उसको बचाना हम लोगों का दायित्व है ,अगर हम उसे खो देंगे उसे भुला देंगे तो एक बात याद रखना मित्रों कि समाज कोई भी क्यों ना हो लेकिन अगर वो अपने आप को इतिहास कि जड़ों से काट देता है ,सांस्कृतिक छाया से अपने आपको अलग कर देता है तो उस समाज में एक नया इतिहास बनाने कि क्षमता नहीं रहती है , एक नया इतिहास वही बना सकता है जो अपने इतिहास में से प्रेरणा लेकर प्राण-शक्ति को प्राप्त करता है
लेकिन दुर्भाग्य से हम लोग अपने खुद के इतिहास के प्रति शर्म अनुभव करते हैं ,खुद को इतिहास से अलग करने का प्रयास करते हैं , बिना अपनी सांस्कृतिक विरासत को ठीक से जाने ,समझे हम उसे पुरानपंथी कहकर गालियाँ देकर उसको नकार देते हैं और तब जाकर एक स्वस्थ समाज का निर्माण करने में रुकावटें पैदा होती हैं
हर भारतीय को ये जानना चाहिए कि हमारा सामर्थ्य क्या था ,हमारी समाज-व्यवस्थाएं क्या थी ,उसमें से कौन सी चीजें अच्छी थी और कौन सी चीजें काल-बाह्य थी ,जो निकम्मी चीजें थी उनको निकाल के बाहर फैंक देना ये हमेशा से हमारे समाज कि ताकत रही है , जब-२ हमारे भीतर बुराइयां पैदा हुई हमारे अंदर कमियां आईं तो उन्हें दूर करने के लिए हमारे समाज के ही भीतर से तेजस्वी,ओजस्वी ,प्राणवान महापुरषों का जन्म हुआ , छुआछूत को हमने जन्म दिया तो कोई गांधी आया जिसने उसके खिलाफ जंग छेड़ दी , जब हम केवल ईश्वरभक्ति में लीन थे तब कोई विवेकानंद आया जिसने हमें कहा कि अरे ये सब छोडो और दरिद्रनारायण कि सेवा करो
इस देश को नेताओं ने या सरकारों ने नहीं बनाया था ,यह देश ऋषियों ने ,मुनियों ने ,संतों ने ,शिक्षकों ने बनाया था और तब जाकर के यह देश बना था , संत शक्ति के सामर्थ्य और सहस्त्रों वर्षों कि परम्परा का ये परिणाम है परन्तु गुलामी के कालखंड के कारण हम अपना स्वाभिमान खो चुके हैं ,आत्मगौरव के साथ दुनिया कि आँख में आँख मिलाकर दुनिया को हमारी क्षमता का परिचय कराने कि आदत जा चुकी है ,लेकिन दोस्तों मैं एक बहुत ही आशावादी व्यक्ति हूँ विश्वास मेरी रगों में दौड़ता है ,मेरा पसीना विकास के मंत्र से पुलकित होता है और अपने गुजरात के अनुभव से मैं आपको यकीन दिलाना चाहता हूँ कि निराश होने का कोई कारण नहीं है ,हम आज भी सब कुछ कर सकते हैं अगर करना चाहें तो ''
( नरेंद्र मोदी जी द्वारा '' आचार्यकुलम् '' शिक्षण संस्थान के उद्घाटन पर व्यक्त किये गए विचारों का कुछ अंश )
जिस संस्कृति के कारण हम आज भी खत्म नहीं हुए हैं ,जिसने हमें आज भी बचाए रखा है उसको बचाना हम लोगों का दायित्व है ,अगर हम उसे खो देंगे उसे भुला देंगे तो एक बात याद रखना मित्रों कि समाज कोई भी क्यों ना हो लेकिन अगर वो अपने आप को इतिहास कि जड़ों से काट देता है ,सांस्कृतिक छाया से अपने आपको अलग कर देता है तो उस समाज में एक नया इतिहास बनाने कि क्षमता नहीं रहती है , एक नया इतिहास वही बना सकता है जो अपने इतिहास में से प्रेरणा लेकर प्राण-शक्ति को प्राप्त करता है
लेकिन दुर्भाग्य से हम लोग अपने खुद के इतिहास के प्रति शर्म अनुभव करते हैं ,खुद को इतिहास से अलग करने का प्रयास करते हैं , बिना अपनी सांस्कृतिक विरासत को ठीक से जाने ,समझे हम उसे पुरानपंथी कहकर गालियाँ देकर उसको नकार देते हैं और तब जाकर एक स्वस्थ समाज का निर्माण करने में रुकावटें पैदा होती हैं
हर भारतीय को ये जानना चाहिए कि हमारा सामर्थ्य क्या था ,हमारी समाज-व्यवस्थाएं क्या थी ,उसमें से कौन सी चीजें अच्छी थी और कौन सी चीजें काल-बाह्य थी ,जो निकम्मी चीजें थी उनको निकाल के बाहर फैंक देना ये हमेशा से हमारे समाज कि ताकत रही है , जब-२ हमारे भीतर बुराइयां पैदा हुई हमारे अंदर कमियां आईं तो उन्हें दूर करने के लिए हमारे समाज के ही भीतर से तेजस्वी,ओजस्वी ,प्राणवान महापुरषों का जन्म हुआ , छुआछूत को हमने जन्म दिया तो कोई गांधी आया जिसने उसके खिलाफ जंग छेड़ दी , जब हम केवल ईश्वरभक्ति में लीन थे तब कोई विवेकानंद आया जिसने हमें कहा कि अरे ये सब छोडो और दरिद्रनारायण कि सेवा करो
इस देश को नेताओं ने या सरकारों ने नहीं बनाया था ,यह देश ऋषियों ने ,मुनियों ने ,संतों ने ,शिक्षकों ने बनाया था और तब जाकर के यह देश बना था , संत शक्ति के सामर्थ्य और सहस्त्रों वर्षों कि परम्परा का ये परिणाम है परन्तु गुलामी के कालखंड के कारण हम अपना स्वाभिमान खो चुके हैं ,आत्मगौरव के साथ दुनिया कि आँख में आँख मिलाकर दुनिया को हमारी क्षमता का परिचय कराने कि आदत जा चुकी है ,लेकिन दोस्तों मैं एक बहुत ही आशावादी व्यक्ति हूँ विश्वास मेरी रगों में दौड़ता है ,मेरा पसीना विकास के मंत्र से पुलकित होता है और अपने गुजरात के अनुभव से मैं आपको यकीन दिलाना चाहता हूँ कि निराश होने का कोई कारण नहीं है ,हम आज भी सब कुछ कर सकते हैं अगर करना चाहें तो ''
( नरेंद्र मोदी जी द्वारा '' आचार्यकुलम् '' शिक्षण संस्थान के उद्घाटन पर व्यक्त किये गए विचारों का कुछ अंश )

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